शिव विवाह (Shiv Vivah): ब्रह्मांडीय चेतना और शक्ति के मिलन का विस्तृत शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक विश्लेषण
सनातन धर्म के इतिहास में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह मात्र दो दैवीय सत्ताओं का मिलन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना (Purusha) और आदि शक्ति (Prakriti) के एकीकरण का सर्वोच्च प्रतीक है। शिव विवाह (Shiv Vivah) की यह कथा आध्यात्मिक साधना, अटूट भक्ति, धैर्य और सृष्टि के संतुलन की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त करती है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, यह विवाह सृष्टि की निरंतरता के लिए अनिवार्य था, क्योंकि इसी मिलन से उस शक्ति का प्रादुर्भाव होना था जो तारकासुर जैसे आततायी का अंत कर सके 1। शिव विवाह (Shiv Vivah) की इस गाथा को समझने के लिए हमें सती के आत्मदाह से लेकर पार्वती की कठोर तपस्या और अंततः हिमालय की कंदराओं में गूंजने वाली उस दिव्य बारात तक के सफर का विश्लेषण करना होगा।
शिव विवाह (Shiv Vivah) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सती का प्रसंग
शिव विवाह (Shiv Vivah) की इस अलौकिक यात्रा का आरंभ देवी सती के रूप में शक्ति के प्रथम अवतार से होता है। प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में सती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था, परंतु दक्ष के अहंकार और शिव के प्रति उनके विद्वेष के कारण एक महान त्रासद घटना घटी। जब दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया और उसमें शिव को आमंत्रित नहीं किया, तो सती ने अपने पति के अपमान को सहन न करते हुए योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया 3। सती के इस विरह में शिव गहरे वैराग्य और अंतहीन समाधि में चले गए। संसार का संतुलन बिगड़ने लगा, क्योंकि शिव, जो संहार और सृजन के अधिपति हैं, पूर्णतः विरक्त होकर अपनी आंतरिक चेतना में लीन हो गए 3।
सती ने अपने प्राण त्यागते समय यह संकल्प लिया था कि वह पुनः जन्म लेकर शिव की अर्धांगिनी बनेंगी। इसी संकल्प के फलस्वरूप उनका पुनर्जन्म हिमालय राज हिमवान और रानी मैना के घर पुत्री के रूप में हुआ, जिनका नाम पार्वती रखा गया 5। पार्वती का जन्म ही शिव को उनकी समाधि से जगाने और संसार को तारकासुर के भय से मुक्त करने के लिए हुआ था, क्योंकि तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु केवल शिव के पुत्र के हाथों ही संभव है 1।
| पहलू | देवी सती (प्रथम अवतार) | माता पार्वती (द्वितीय अवतार) |
| पिता | प्रजापति दक्ष | पर्वतराज हिमालय |
| स्वभाव | आवेशपूर्ण और स्वाभिमानी | धैर्यवान और तपस्वी |
| विवाह का आधार | चयन और सामाजिक मर्यादा | कठोर तपस्या और आंतरिक भक्ति |
| अंत/परिणाम | आत्मदाह (योग अग्नि) | शाश्वत पुनर्मिलन (शिव विवाह) |
पार्वती की दिव्य उत्पत्ति और नारद की भविष्यवाणी
हिमालय की पुत्री पार्वती बचपन से ही विलक्षण गुणों से संपन्न थीं। उनके व्यक्तित्व में हिमालय की स्थिरता और आदि शक्ति की ओजस्विता का मिश्रण था। जब पार्वती मात्र चार वर्ष की थीं, तब देवर्षि नारद ने हिमालय के महल में पदार्पण किया 3। हिमालय ने अपनी पुत्री के भविष्य के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की। नारद ने पार्वती की हस्तरेखाओं का अवलोकन करते हुए एक अत्यंत रहस्यमयी भविष्यवाणी की। उन्होंने बताया कि पार्वती का विवाह एक ऐसे पुरुष से होगा जो त्यागी, निर्गुण, और विचित्र वेशभूषा वाला होगा, जिसके माता-पिता का कोई ज्ञात स्रोत नहीं होगा 3।
नारद की इस भविष्यवाणी ने हिमालय और मैना को चिंतित कर दिया, परंतु पार्वती के भीतर शिव के प्रति अनुराग और गहरा हो गया। नारद ने यह स्पष्ट किया कि वह विचित्र पुरुष साक्षात महादेव हैं, जो स्वयं प्रकाशपुंज और स्वयंभू (Swayambhu) हैं 3। इस प्रकार, शिव विवाह (Shiv Vivah) की नींव पार्वती के बचपन में ही रख दी गई थी। नारद ने पार्वती को शिव की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने का मार्ग सुझाया, जो इस बात का संकेत था कि परमात्मा को प्राप्त करने के लिए इंद्रियों के सुख का त्याग और आंतरिक अनुशासन अनिवार्य है 3।
तारकासुर का आतंक और कामदेव का बलिदान
शिव विवाह (Shiv Vivah) की कथा का एक महत्वपूर्ण मोड़ तारकासुर के अत्याचारों से जुड़ा है। तारकासुर ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध केवल शिव का पुत्र ही कर सकेगा। उसे विश्वास था कि शिव सती के विरह में समाधिस्थ हैं और वे कभी विवाह नहीं करेंगे 1। देवताओं ने जब देखा कि तारकासुर का उत्पात बढ़ रहा है, तो उन्होंने शिव की समाधि भंग करने की योजना बनाई।
देवराज इंद्र ने कामदेव (Kama) और उनकी पत्नी रति को यह कार्य सौंपा कि वे शिव के मन में पार्वती के प्रति प्रेम और विवाह की इच्छा जागृत करें 1। कामदेव ने वसंत ऋतु का अकाल सृजन किया और अपने पुष्प बाणों से शिव पर प्रहार किया। जब शिव की समाधि भंग हुई, तो उन्होंने अपने समक्ष कामदेव को पाया। काम की चेष्टा को अपनी साधना में अवरोध मानकर शिव ने अपना तीसरा नेत्र (Third Eye) खोला, जिससे निकलने वाली प्रचण्ड अग्नि ने कामदेव को क्षण भर में भस्म कर लिया 1। कामदेव का भस्म होना इस बात का प्रतीक है कि शिव के मार्ग में वासना का कोई स्थान नहीं है; वहां केवल विशुद्ध प्रेम और चेतना का वास है 1।
पार्वती की कठोर तपस्या: आध्यात्मिक साधना का चरमोत्कर्ष
कामदेव के भस्म होने के पश्चात पार्वती ने अनुभव किया कि सुंदरता और बाह्य आकर्षण से शिव को नहीं जीता जा सकता। उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपनी तपस्या के बल पर महादेव को प्रसन्न करेंगी। पार्वती ने हिमालय की उच्चतम चोटियों पर जाकर हजारों वर्षों तक तप किया। आरंभिक वर्षों में उन्होंने केवल कंदमूल का सेवन किया, फिर केवल जल पर जीवित रहीं, और अंततः उन्होंने अन्न-जल का पूर्ण त्याग कर दिया, जिसके कारण उन्हें ‘अपर्णा’ कहा गया 1।
पार्वती की इस साधना ने तीनों लोकों को हिला दिया। उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि स्वयं शिव को अपनी समाधि त्यागकर उनकी परीक्षा लेने के लिए विवश होना पड़ा। शिव ने एक युवा ब्रह्मचारी का वेश धारण किया और पार्वती के पास पहुंचे 1। उन्होंने शिव की वेशभूषा, उनके श्मशान निवासी होने और उनके अमंगलकारी स्वरूप की कड़ी आलोचना की ताकि पार्वती का मन बदल सके। परंतु पार्वती ने तर्क दिया कि वास्तविक प्रेम गुणों या बाह्य स्वरूप पर निर्भर नहीं होता; वह तो आत्मा का आत्मा से मिलन है 3। पार्वती की इस अडिग निष्ठा को देखकर शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया 1।
| तपस्या के चरण | आहार/साधना | आध्यात्मिक निहितार्थ |
| प्रथम चरण | कंदमूल और फल | शारीरिक शुद्धि |
| द्वितीय चरण | केवल जल और वायु | मानसिक नियंत्रण |
| तृतीय चरण | निराहार (अपर्णा) | पूर्ण आत्म-समर्पण |
| चतुर्थ चरण | पंचतप (अग्नि के बीच) | इंद्रिय विजय |
शिव विवाह (Shiv Vivah) का ज्योतिषीय और सांस्कृतिक महत्व
शिव और पार्वती का विवाह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को संपन्न हुआ था, जिसे प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है 2। यह तिथि मात्र एक कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि यह वह समय है जब ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं अपने उच्चतम स्तर पर होती हैं और व्यक्ति के लिए अपनी चेतना को ऊपर उठाने का मार्ग सरल हो जाता है 9।
मेरे मन में भी शिव, मेरे तन में भी शिव | Full Shiv Bhajan | Lyrical #meretanmebhishiv
| महत्वपूर्ण तथ्य | विवरण | महत्व |
| तिथि | फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी | चेतना का जागरण |
| नक्षत्र | उत्तरा फाल्गुनी (अक्सर) | वैवाहिक सुख |
| योग | शिव योग | शुभ कार्यों की सिद्धि |
शिव विवाह (Shiv Vivah) का यह उत्सव भारतीय संस्कृति में दांपत्य जीवन के आदर्श के रूप में देखा जाता है। यह सिखाता है कि एक सफल विवाह के लिए त्याग, धैर्य और आपसी सम्मान की आवश्यकता होती है 5।
शिव की विचित्र बारात: सामाजिक और आध्यात्मिक समानता का संदेश
शिव विवाह (Shiv Vivah) की सबसे अनूठी और बहुचर्चित घटना शिव की बारात (Shiv Ki Baraat) है। जब विवाह का दिन निश्चित हुआ, तो भगवान शिव ने अपनी बारात तैयार की। यह कोई साधारण बारात नहीं थी। जहाँ एक ओर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर और देवराज इंद्र ऐरावत पर बैठकर अपनी दिव्य सेनाओं के साथ आए, वहीं दूसरी ओर शिव के गणों का समूह अत्यंत विचित्र और भयावह था 7।
शिव की बारात में भूत-प्रेत, पिशाच, डाकनी-शाकिनी, नंदी, भृंगी और सभी प्रकार के जीव-जंतु शामिल थे। कुछ गणों के मुख नहीं थे, कुछ के अनेक मुख थे; कुछ के हाथ-पैर नहीं थे, तो कुछ के शरीर पर अनगिनत अंग थे 7। शिव स्वयं नग्न अवस्था में, भस्म रमाए, बाघंबर पहने और गले में सर्पों की माला धारण किए नंदी पर सवार होकर निकले 7।
इस बारात का दार्शनिक अर्थ यह है कि शिव ‘पशुपति’ हैं, अर्थात वे संसार के उन सभी जीवों के नाथ हैं जिन्हें समाज ने तिरस्कृत या अमंगलकारी मानकर छोड़ दिया है 10। शिव का यह स्वरूप बताता है कि परमात्मा की दृष्टि में कोई भी जीव अछूत या घृणित नहीं है। शिव विवाह (Shiv Vivah) के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सृजन की प्रक्रिया में सुंदर और कुरूप, सुसंस्कृत और आदिम, दोनों का समान महत्व है 5।
| बारात के सदस्य | स्वरूप | प्रतीक |
| नंदी | बैल | धर्म और भक्ति |
| भृंगी | कंकालनुमा ऋषि | ज्ञान और वैराग्य |
| भूत-प्रेत | छायाकार आकृतियाँ | विस्मृत ऊर्जाएँ |
| देवता | दिव्य व प्रकाशमान | सात्विक गुण |
हिमवान के द्वार पर बारात का आगमन और रानी मैना का मोहभंग
जब शिव की बारात हिमालय की राजधानी पहुँची, तो स्वागत के लिए खड़ी रानी मैना और नगरवासी शिव के रौद्र और विचित्र स्वरूप को देखकर भयभीत हो गए। रानी मैना तो शिव का भयानक वेश देखकर मूर्छित ही हो गईं 5। उन्होंने अपनी पुत्री पार्वती को ऐसे ‘अघोरी’ को सौंपने से इनकार कर दिया। हिमालय के राजा भी दुविधा में पड़ गए क्योंकि शिव के कुल और गोत्र का किसी को पता नहीं था 7।
इस विषम स्थिति में देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने अपनी वीणा के स्वर से सबको शांत किया और समझाया कि शिव ‘स्वयंभू’ हैं—वे स्वयं ही अपने पिता, माता और कुल हैं। वे आदि और अंत से परे शुद्ध ध्वनि (Naad) और कंपन हैं 7। पार्वती के विशेष अनुरोध पर, शिव ने अपनी लीला दिखाते हुए एक अत्यंत सुंदर और मनमोहक स्वरूप धारण किया, जिसे ‘सुंदरमूर्ति’ (Sundaramurti) कहा गया 5। शिव का यह स्वरूप इतना दीप्तिमान था कि उनकी तुलना में कामदेव की सुंदरता भी फीकी पड़ गई। नौ फीट ऊंचे, गौर वर्ण और दिव्य आभूषणों से सुसज्जित शिव को देखकर रानी मैना का संशय दूर हुआ और उन्होंने सहर्ष विवाह की अनुमति दी 5।
त्रियुगीनारायण मंदिर: शिव विवाह (Shiv Vivah) का वास्तविक ऐतिहासिक स्थल
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर (Triyuginarayan Temple) वह पावन स्थान माना जाता है जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था 6। इस मंदिर की महिमा इसके नाम ‘त्रि-युगी’ में छिपी है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ तीन युगों से अग्नि प्रज्वलित है। मान्यता है कि शिव और पार्वती ने इसी मंदिर के भीतर स्थित अग्निकुंड के फेरे लिए थे, और वह अग्नि आज भी ‘अखंड धुनी’ के रूप में जल रही है 6।
विवाह के प्रमुख साक्षी और उनकी भूमिका
शिव विवाह (Shiv Vivah) के समय ब्रह्मांड की प्रमुख शक्तियों ने विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं:
- भगवान विष्णु: उन्होंने पार्वती के भाई के रूप में सभी रस्में निभाईं। उन्होंने ही विवाह का औपचारिक प्रस्ताव रखा और कन्यादान की प्रक्रिया में सहयोग किया 6।
- भगवान ब्रह्मा: वे इस दिव्य विवाह के मुख्य पुरोहित (Priest) बने। उन्होंने ही वेदों के मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न कराया 6।
- हिमालय: पर्वतराज हिमालय ने पिता के रूप में कन्यादान किया और अपनी पुत्री को महादेव को सौंपा 2।
मंदिर परिसर के पवित्र कुंड और उनका महत्व
त्रियुगीनारायण मंदिर में चार पवित्र कुंड हैं, जहाँ देवताओं ने विवाह से पूर्व स्नान किया था:
- ब्रह्म कुंड: यहाँ ब्रह्मा जी ने विवाह संस्कार से पूर्व स्नान किया था 6।
- विष्णु कुंड: यह कुंड भगवान विष्णु के स्नान के लिए था 6।
- रुद्र कुंड: शिव (रुद्र) के आगमन की स्मृति में यह कुंड पवित्र माना जाता है 6।
- सरस्वती कुंड: माना जाता है कि इस कुंड का जल विष्णु की नाभि से प्रकट हुआ था और यह अन्य कुंडों को जल प्रदान करता है 6।
| कुंड का नाम | जल का स्रोत | महत्व |
| सरस्वती कुंड | विष्णु की नाभि | जीवन का स्रोत |
| ब्रह्म कुंड | पवित्र स्नान | शुद्धि और ज्ञान |
| विष्णु कुंड | औपचारिक कृत्य | स्थिरता और पालन |
| रुद्र कुंड | शिव की उपस्थिति | संहार और पुनर्जन्म |
शिव और शक्ति: पुरुष और प्रकृति का दार्शनिक एकीकरण
शिव विवाह (Shiv Vivah) का दार्शनिक आधार सांख्य दर्शन (Samkhya Philosophy) में निहित है, जो ‘पुरुष’ और ‘प्रकृति’ के संबंधों की व्याख्या करता है। इस संदर्भ में शिव ‘पुरुष’ (शुद्ध चेतना) हैं और पार्वती ‘प्रकृति’ (ऊर्जा और पदार्थ) हैं 9।
पुरुष (शिव) स्वयं में निष्क्रिय, अपरिवर्तनीय और दृष्टा मात्र है। बिना शक्ति (प्रकृति) के शिव ‘शव’ के समान हैं, क्योंकि चेतना बिना ऊर्जा के अभिव्यक्त नहीं हो सकती 9। वहीं दूसरी ओर, शक्ति बिना शिव के दिशाहीन ऊर्जा है। जब इन दोनों का मिलन होता है, तभी सृजन की प्रक्रिया संभव होती है। शिव विवाह (Shiv Vivah) इसी ब्रह्मांडीय संतुलन का उत्सव है।
अर्धनारीश्वर स्वरूप की प्रासंगिकता
शिव और पार्वती के विवाह के पश्चात उनका मिलन ‘अर्धनारीश्वर’ (Ardhanarishwara) स्वरूप में परिलक्षित होता है, जिसमें आधा शरीर पुरुष (शिव) का और आधा स्त्री (शक्ति) का है 16। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर पुरुषोचित (दृढ़ता, ज्ञान) और स्त्रियोचित (करुणा, सृजनशीलता) दोनों गुण विद्यमान होते हैं। शिव विवाह (Shiv Vivah) बाहरी विवाह से अधिक व्यक्ति के भीतर की इन दोनों ऊर्जाओं के संतुलन का मार्ग है 9।
महाशिवरात्रि: शिव विवाह (Shiv Vivah) की वार्षिक स्मृति और साधना
महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का पर्व विशेष रूप से शिव विवाह (Shiv Vivah) के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और रात्रि जागरण करते हैं। इस अनुष्ठान के पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तर्क है।
- जल और दूध का अभिषेक: यह मन की शांति और विचारों की शुद्धि का प्रतीक है 9।
- बेल पत्र का अर्पण: तीन पत्तियों वाला बेल पत्र सत्व, रज और तम गुणों के समर्पण का प्रतीक है, जिससे भक्त अपने अहंकार को त्यागकर शिव के चरणों में समर्पित होता है 9।
- रात्रि जागरण (Jagarana): यह अज्ञानता के अंधकार को दूर कर जागरूकता की ज्योति जलाने का प्रतीक है 8।
| अनुष्ठान | प्रतीक | लाभ |
| शहद अर्पण | मधुर वाणी और व्यवहार | संबंधों में मिठास |
| भस्म धारण | नश्वरता का बोध | अहंकार का नाश |
| रुद्राभिषेक | ब्रह्मांडीय कंपन | मानसिक शांति |
| भांग/धतूरा | विष का नियंत्रण | विकारों पर विजय |
शिव विवाह (Shiv Vivah) के दौरान प्रयुक्त दिव्य आभूषणों का रहस्य
विवाह के समय शिव ने जो वेशभूषा धारण की थी, उसके प्रत्येक तत्व का एक गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ है। शिव विवाह (Shiv Vivah) केवल बाह्य श्रृंगार नहीं, बल्कि प्रतीकों के माध्यम से ब्रह्मांडीय ज्ञान का संप्रेषण है।
- चंद्रमा (Crescent Moon): शिव के माथे पर विराजमान चंद्रमा समय और मन पर नियंत्रण का प्रतीक है। विवाह के समय यह दर्शाता है कि यह मिलन काल के बंधनों से मुक्त है 9।
- सर्प (Serpents): शिव के गले और शरीर पर लिपटे सर्प कुंडलिनी शक्ति और मृत्यु पर विजय के प्रतीक हैं। यह इंगित करता है कि शिव भय और वासना के स्वामी हैं 10।
- भस्म (Ashes): शरीर पर मली हुई भस्म इस सत्य की याद दिलाती है कि संसार नश्वर है और अंततः सब कुछ राख में मिल जाना है 5।
- त्रिशूल और डमरू (Trident and Damru): त्रिशूल तीन गुणों (सत्व, रज, तम) और डमरू ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि (Naad) का प्रतिनिधित्व करता है 9।
आधुनिक काल में त्रियुगीनारायण और डेस्टिनेशन वेडिंग
वर्तमान समय में, त्रियुगीनारायण मंदिर न केवल एक तीर्थ स्थल है, बल्कि यह एक लोकप्रिय ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ (Destination Wedding) केंद्र के रूप में भी उभरा है 14। उत्तराखंड सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर विवाह स्थल के रूप में प्रचारित किया है। प्रतिवर्ष सैकड़ों जोड़े यहाँ आकर उसी अखंड अग्नि के समक्ष सात फेरे लेते हैं, जिसके साक्षी कभी स्वयं देवता बने थे 14।
यहाँ विवाह करने की प्रक्रिया अत्यंत सुव्यवस्थित है। मंदिर समिति के माध्यम से पंजीकरण (Registration) कराना होता है, और स्थानीय ब्राह्मणों द्वारा वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न कराया जाता है 14। मान्यता है कि यहाँ विवाह करने वाले जोड़ों को शिव और पार्वती का अक्षय आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनका दांपत्य जीवन सुखमय रहता है 6।
विवाह पंजीकरण और सुविधाएँ
| सेवा का नाम | विवरण | अनुमानित लागत |
| पंजीकरण शुल्क | मंदिर समिति को देय | ₹1,100 |
| विवाह पैकेज | ठहरने, खाने और सजावट सहित | ₹3-4 लाख |
| मुख्य पुजारी | विवाह की रस्में संपन्न कराना | स्वेच्छानुसार दक्षिणा |
शिव विवाह (Shiv Vivah) की कथा से प्राप्त जीवन मंत्र
शिव और पार्वती के विवाह की यह गाथा हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाती है:
- अटूट भक्ति और संकल्प: पार्वती की तपस्या सिद्ध करती है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो साक्षात ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है 3।
- समानता का भाव: शिव की बारात में देवताओं के साथ-साथ भूत-प्रेतों का होना यह दर्शाता है कि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना ही वास्तविक धर्म है 7।
- दिखावे से मुक्ति: शिव का अमंगलकारी वेश में आना और फिर सुंदर स्वरूप धारण करना यह सिखाता है कि सत्य बाह्य स्वरूप में नहीं, बल्कि आंतरिक गुण में निहित होता है 5।
- विवाह का आध्यात्मिक आधार: विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का एक उच्चतर उद्देश्य के लिए एक होना है 1।
शिव पुराण और कुमारसंभव में शिव विवाह (Shiv Vivah) का वर्णन
महाकवि कालिदास कृत ‘कुमारसंभवम्’ और ‘शिव पुराण’ में इस दिव्य मिलन का अत्यंत काव्यमयी वर्णन मिलता है 1। कालिदास ने हिमालय की सुंदरता और पार्वती की तपस्या को शब्दों के माध्यम से जीवंत कर दिया है। शिव पुराण में विस्तृत रूप से उन मंत्रों और अनुष्ठानों का उल्लेख है जो विवाह के दौरान संपन्न किए गए थे 12।
इन ग्रंथों के अनुसार, शिव और पार्वती का विवाह मात्र एक संयोग नहीं था, बल्कि यह पूर्व-निर्धारित था। सती के रूप में जो अधूरापन रह गया था, वह पार्वती के रूप में पूर्णता को प्राप्त हुआ। यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि प्रेम और भक्ति में वह शक्ति है जो स्वयं महादेव को भी वैराग्य छोड़कर गृहस्थ धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है 3।
शिव विवाह (Shiv Vivah) का विश्व शांति और संतुलन में योगदान
माना जाता है कि शिव और पार्वती के विवाह के क्षण ब्रह्मांड में एक ऐसी शांति और ऊर्जा का संचार हुआ जिसने सभी नकारात्मक शक्तियों को शांत कर दिया 9। तारकासुर के भय से मुक्त होने के लिए देवताओं ने जिस पुत्र की कामना की थी, वह कार्तिकेय के रूप में प्राप्त हुआ 1।
इस प्रकार, शिव विवाह (Shiv Vivah) केवल एक व्यक्तिगत मिलन नहीं था, बल्कि यह एक सुरक्षा कवच था जिसने देवलोक और पृथ्वी लोक दोनों को विनाश से बचाया। आज भी जब हम शिव विवाह (Shiv Vivah) की कथा सुनते हैं, तो यह हमें आंतरिक और बाह्य शांति का मार्ग दिखाती है।
| परिणाम | विवरण | आध्यात्मिक प्रभाव |
| कार्तिकेय का जन्म | देवताओं के सेनापति | बुराई का नाश |
| गृहस्थ धर्म की स्थापना | शिव का परिवार | समाज का आधार |
| योग और भोग का मिलन | संतुलन | संपूर्ण जीवन |
निष्कर्ष
शिव विवाह (Shiv Vivah) की यह विस्तृत चर्चा हमें इस निष्कर्ष पर ले जाती है कि भगवान शिव और माता पार्वती का गठबंधन ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना है। यह अंधकार पर प्रकाश, अराजकता पर व्यवस्था और वासना पर पवित्र प्रेम की विजय का प्रतीक है। हिमालय की गोद में, त्रियुगीनारायण की अखंड अग्नि के साक्षित्व में हुआ यह विवाह आज भी प्रत्येक भक्त के हृदय में श्रद्धा और भक्ति का संचार करता है। चाहे वह महाशिवरात्रि का उपवास हो या त्रियुगीनारायण में सात फेरे लेने का संकल्प, शिव विवाह (Shiv Vivah) का हर पहलू हमें अपनी आत्मा के भीतर छिपे शिव और शक्ति को पहचानने के लिए प्रेरित करता है। यह गाथा युगों-युगों तक मानवता को संयम, सेवा और समर्पण का पाठ पढ़ाती रहेगी।
शिव विवाह (Shiv Vivah) का यह विस्तृत आलेख न केवल धार्मिक ज्ञान का स्रोत है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका भी है जो हमें भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच संतुलन बनाना सिखाती है। शिव और पार्वती का यह दिव्य मिलन सदैव हमारे अस्तित्व का आधार बना रहेगा।
Lyrics : Shiv Vivah Bhajan
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
आज सुनो शिव जी के द्वारे,
भीड़ मची है भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
भूत प्रेत सब जुर मिल आये,
ढंग बड़े बेढंगा लूला लंगड़ा
काना कुबड़ा, कोऊ कोऊ नंग धडंगा
कौनऊ दुबरौ कौनऊ पतरौ,
कौनऊ कौनऊ भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
राख ओल बाघंबर पहने,
बहे जटा सें गंगा
कंकन हाथ बांध बिछुअन के,
लिपटो गरे भुजंगा
हाथी घोड़ा जूजो नैयां,
डूंड़ा करी सवारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
देख दशा भोले की बोले,
देवों सें जगदीश्वर
अपनी टोली अलग बना लो,
अलग चलें नंदीश्वर
संग निगें तौ पर पुर जाकैं,
कटहै नाक हमारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
सुन सुन बातें कमलापति की,
भोले मन मुस्कावें
ऐसौ भलौ स्वभाव हरि,
के व्यंग वचन न जावैं
भले दूर सें निगौ छवि न,
मन सें हटै तुम्हारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
बाजन लागे ढोल ढमाढम,
बजन लगो रमतूला
देख देख सब हंसी उड़ावें,
भलौ बने है दूल्हा
नाचन लागे भूत प्रेत,
भई चलवे की तैयारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
उतै हिमाचल जू नै अपनो,
ऐसो नगर संवारौ
आज लगै ऐसै जैसै,
धरती पै स्वर्ग उतारो
गली गली और नगर नगर की,
देखो शोभा न्यारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी प
हुचन लगी बारात नगर में,
देखन खौं सब आये.
पैल देख देवों की टोली,
सब मन में हर्षाये
जब देखी दूल्हा कि सूरत,
भगदड़ मच गई भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिवभोला भंडारी
घर घर में सब खबर सुना रये,
ऐसी लड़का बाले
बड़ो भयंकर दूल्हा देखो,
संग भूत मतवारे
देखत जिंदा बचो समझलो,
ऊकी किस्मत भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
मैना रानी बड़ी दुखी भई,
जियत उमा न ब्याहों
लै बिटिया खों गिरौ कुंआ या,
खाय जहर मर जाहों
तब आये नारद जी आकैं,
सबरी बात संवारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
भओ शिव के संग ब्याह उमा कौ,
घर घर बजे बधाये
मंगल गान अप्सरा गावें,
देव फू्ल बरसावै
विदा भई शिव संग उमा की,
खुशी भये नर नारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी