Radha Rani History in Hindi : “राधा रानी का संपूर्ण इतिहास और रहस्य: जन्म, प्रेम, विवाह और अंतर्धान की अनसुनी कथा”

Table of Contents

राधा रानी का संपूर्ण इतिहास और रहस्य: जन्म, प्रेम, विवाह और अंतर्धान की अनसुनी कथा (Radha Rani Ka Itihaas)

ब्रज की धूल में आज भी एक ही नाम गूंजता है— “राधे-राधे”। भगवान श्रीकृष्ण भले ही पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हों, लेकिन उनके हृदय की स्वामिनी केवल और केवल श्री राधा रानी हैं। सनातन धर्म में, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय में, राधा रानी का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है। लेकिन क्या आप वास्तव में राधा रानी का इतिहास (Radha Rani History in Hindi) जानते हैं?

उनका जन्म कैसे हुआ? क्या राधा जी और श्रीकृष्ण का विवाह हुआ था? श्रीमद्भागवत पुराण में राधा रानी का नाम क्यों नहीं है? और अंत में राधा रानी का क्या हुआ? अगर आप एक कृष्ण भक्त हैं और राधा जी के जीवन के अनसुलझे रहस्यों को जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है।

इस विस्तृत लेख में हम राधा रानी के गोलोक से पृथ्वी पर आने, उनके प्राकट्य, बाल लीलाओं, रासलीला, उनके विवाह, विरह और अंतर्धान की पूरी कथा को शास्त्रों (जैसे ब्रह्म वैवर्त पुराण, गर्ग संहिता और पद्म पुराण) के आधार पर विस्तार से जानेंगे।

RADHA RANI

विषय सूची (Table of Contents)

  1. राधा रानी कौन हैं? (Who is Radha Rani?)
  2. राधा रानी के पृथ्वी पर जन्म का कारण: श्रीदामा का शाप
  3. राधा रानी का प्राकट्य (जन्म) कथा: रावल गांव का रहस्य
  4. जब राधा जी ने पहली बार अपनी आंखें खोलीं
  5. श्री राधा और कृष्ण का प्रथम मिलन (भांडीरवन का रहस्य)
  6. राधा रानी का अयान (अभिमन्यु) से विवाह
  7. श्रीमद्भागवत महापुराण में राधा जी का नाम क्यों नहीं है?
  8. राधा रानी की अष्टसखियां (Ashta Sakhis of Radha)
  9. कृष्ण का मथुरा गमन और राधा रानी का विरह
  10. राधा रानी का अंतर्धान: उनका अंतिम समय कैसे बीता?
  11. निष्कर्ष
  12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. राधा रानी कौन हैं? (Who is Radha Rani?)

राधा रानी का इतिहास समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि वास्तव में राधा कौन हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से, राधा कोई साधारण स्त्री नहीं हैं; वे भगवान श्रीकृष्ण की ‘ह्लादिनी शक्ति’ (Hladini Shakti) हैं। ह्लादिनी शक्ति का अर्थ है ‘आनंद देने वाली शक्ति’।

परमेश्वर श्रीकृष्ण जब स्वयं आनंद का अनुभव करना चाहते हैं, तो वे अपने ही भीतर से अपनी आनंद शक्ति को प्रकट करते हैं, जो श्री राधा हैं। अर्थात्, कृष्ण और राधा दो अलग-अलग शरीर जरूर हैं, लेकिन आत्मा एक ही है।

“राधा कृष्ण एक आत्मा, दोई देह धरि। विलास करे वृंदावन में, आनंद की झरी।।”

गौड़ीय वैष्णव दर्शन के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण शक्तिमान हैं और राधा रानी उनकी शक्ति हैं। आग और उसकी गर्मी को जैसे अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही राधा और कृष्ण को अलग नहीं किया जा सकता।

RADHA RANI

2. राधा रानी के पृथ्वी पर जन्म का कारण: श्रीदामा का शाप

बहुत से लोग यह सोचते हैं कि राधा रानी साधारण रूप से पृथ्वी पर उत्पन्न हुईं, लेकिन ऐसा नहीं है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, राधा रानी और श्रीकृष्ण नित्य गोलोक वृंदावन में निवास करते हैं। उनके पृथ्वी पर आने के पीछे एक बहुत बड़ा रहस्य और एक शाप छिपा हुआ है।

कथा के अनुसार, एक बार गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी एक सखी ‘विरजा’ के साथ विहार कर रहे थे। जब राधा रानी को इस बात का पता चला, तो उन्हें क्रोध आ गया। वे तुरंत उस स्थान पर पहुंचीं। उनके क्रोध को देखकर विरजा नदी के रूप में परिवर्तित होकर वहां से बहने लगीं।

राधा जी जब कृष्ण पर क्रोधित हो रही थीं, तब वहां श्रीकृष्ण के परम मित्र और सेवक श्रीदामा उपस्थित थे। श्रीदामा को राधा जी का कृष्ण पर क्रोधित होना बिल्कुल पसंद नहीं आया। श्रीदामा ने राधा जी को टोक दिया, जिसके कारण राधा रानी ने क्रोध में आकर श्रीदामा को शाप दिया कि, “तुम असुर कुल में जन्म लोगे।” (यही श्रीदामा बाद में शंखचूड़ नामक असुर बने)।

इसके प्रतिउत्तर में श्रीदामा ने भी राधा रानी को शाप दे दिया:

“हे देवी! आपने मुझे अकारण शाप दिया है। इसलिए आपको भी गोलोक छोड़कर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाना होगा। वहां आपका विवाह कृष्ण से नहीं बल्कि किसी और से होगा (छाया विवाह), और आपको श्रीकृष्ण का 100 वर्षों तक विरह (Separation) सहना पड़ेगा।”

श्रीकृष्ण ने आकर बीच-बचाव किया और राधा जी को समझाया कि यह सब मेरी ही लीला का एक हिस्सा है। द्वापर युग में मैं पृथ्वी पर अवतार लूंगा और आप भी वहां अवतार लेंगी। इसी शाप के कारण राधा रानी का जन्म पृथ्वी पर हुआ।

3. राधा रानी का प्राकट्य (जन्म) कथा: रावल गांव का रहस्य

राधा रानी का जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं हुआ था। वे ‘अयोनिजा’ हैं। उनका जन्म मथुरा के पास रावल (Rawal) नामक गांव में हुआ था। बाद में उनके पिता बरसाना (Barsana) चले गए थे।

राधा अष्टमी का दिन:

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि (कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद) को राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। इस दिन को आज भी पूरी दुनिया में राधा अष्टमी के रूप में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

प्राकट्य की कथा:

राजा वृषभानु (Vrishabhanu) रावल गांव के मुखिया थे। उनकी पत्नी का नाम कीर्तिदा (Kirtida) था। राजा वृषभानु और कीर्तिदा दोनों ही भगवान के अनन्य भक्त थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी।

एक दिन सुबह-सुबह राजा वृषभानु यमुना नदी (कुछ कथाओं में रावल के कुंड) में स्नान करने गए। वहां उन्होंने देखा कि पानी के बीच में एक बहुत बड़ा, स्वर्ण के समान चमकता हुआ कमल का फूल खिला है। उस कमल के फूल के चारों ओर अद्भुत प्रकाश फैल रहा था।

जब राजा वृषभानु उस फूल के पास गए, तो उन्होंने देखा कि उस कमल के फूल के बीच एक अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी छोटी सी कन्या खेल रही है। आकाश से ब्रह्मा जी की आवाज आई कि, “हे वृषभानु! यह कन्या साक्षात जगदम्बा हैं, इन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करें।” वृषभानु जी खुशी-खुशी उस बच्ची को महल ले आए और माता कीर्तिदा की गोद में सौंप दिया। इसी बच्ची का नाम ‘राधा’ रखा गया।

RADHA RANI

4. जब राधा जी ने पहली बार अपनी आंखें खोलीं

राधा रानी के प्राकट्य के बाद एक बड़ी समस्या आ गई। बच्ची बहुत सुंदर और स्वस्थ थी, लेकिन वह अपनी आंखें नहीं खोल रही थी। राजा वृषभानु और माता कीर्तिदा बहुत दुखी हो गए कि क्या उनकी पुत्री जन्म से ही अंधी है? उन्होंने कई वैद्यों को बुलाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

वास्तव में, राधा रानी ने यह प्रण लिया था कि वे पृथ्वी पर अवतार लेने के बाद, सबसे पहले अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण के ही दर्शन करेंगी, उससे पहले किसी और को नहीं देखेंगी।

कुछ दिनों बाद, गोकुल से नंद बाबा और माता यशोदा अपने बालक कन्हैया (श्रीकृष्ण) को लेकर वृषभानु जी को बधाई देने के लिए रावल गांव पहुंचे। माता यशोदा ने कन्हैया को पालने में लिटा दिया और माता कीर्तिदा से बात करने लगीं।

बालक कृष्ण रेंगते-रेंगते उस पालने तक पहुंच गए जहां वृषभानु नंदिनी (राधा) लेटी हुई थीं। जैसे ही कृष्ण ने अपना हाथ बढ़ाकर राधा जी के चेहरे को छुआ और कृष्ण की दिव्य सुगंध राधा जी तक पहुंची, राधा रानी ने तुरंत अपनी आंखें खोल दीं।

उन्होंने मृत्युलोक में सबसे पहला दर्शन अपने आराध्य श्रीकृष्ण का किया। यह देखकर दोनों परिवार खुशी से झूम उठे।

5. श्री राधा और कृष्ण का प्रथम मिलन (भांडीरवन का रहस्य)

राधा रानी का इतिहास उनकी प्रेम लीलाओं के बिना अधूरा है। बड़े होने पर राजा वृषभानु रावल से बरसाना (Barsana) आ गए और नंद बाबा गोकुल से नंदगांव (Nandgaon) आ गए। दोनों गांव पास-पास ही थे।

राधा और कृष्ण का बचपन गायों को चराते, यमुना किनारे खेलते और सखियों के साथ रास रचाते हुए बीता। गर्ग संहिता के अनुसार, राधा और कृष्ण का विवाह स्वयं ब्रह्मा जी ने संपन्न कराया था।

भांडीरवन का विवाह (Bhandirvan Marriage):

एक बार नंद बाबा बालक कृष्ण को लेकर भांडीरवन नामक जंगल से गुजर रहे थे। अचानक भयंकर आंधी-तूफान आ गया। नंद बाबा डर गए कि बालक कृष्ण को कैसे बचाएं। उसी समय वहां एक अद्भुत प्रकाश हुआ और साक्षात राधा रानी अपने दिव्य किशोर रूप में वहां प्रकट हुईं।

नंद बाबा समझ गए कि यह कोई साधारण घटना नहीं है। उन्होंने बालक कृष्ण को राधा रानी को सौंप दिया। कृष्ण ने भी अपना किशोर रूप धारण कर लिया। तभी वहां ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने गंधर्व रीति से राधा और कृष्ण का विवाह संपन्न कराया। लेकिन यह विवाह दुनिया की नजरों से छिपा हुआ था। यह केवल एक आध्यात्मिक और दिव्य विवाह था।

RADHA RANI

6. राधा रानी का अयान (अभिमन्यु) से विवाह

अगर राधा और कृष्ण का विवाह हो गया था, तो फिर राधा जी को ‘परकीया’ (Parakiya Bhava – किसी और की पत्नी होते हुए कृष्ण से प्रेम करना) क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर श्रीदामा के शाप में छिपा है।

श्रीदामा के शाप के कारण राधा जी का सांसारिक विवाह जावट (Javat) गांव के निवासी अयान (जिसका असली नाम अभिमन्यु था) से हुआ था। अयान, जटिला का पुत्र और कुटिला का भाई था।

छाया राधा का रहस्य:

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, जिस समय राधा जी का विवाह अयान से हो रहा था, राधा जी ने अपनी एक ‘छाया’ (Shadow / Illusion) वहां स्थापित कर दी और स्वयं अंतर्धान होकर कृष्ण के पास गोलोक चली गईं या कृष्ण के हृदय में समा गईं। अयान का विवाह उसी ‘छाया राधा’ से हुआ था।

अयान भगवान नारायण का एक महान भक्त था, और उसने वरदान मांगा था कि उसे लक्ष्मी जी पत्नी के रूप में मिलें। लेकिन एक शाप के कारण अयान नपुंसक था। इसलिए वह कभी राधा रानी को स्पर्श भी नहीं कर सका। यह सारी लीला केवल इसलिए रची गई ताकि समाज में ‘परकीया भाव’ (निस्वार्थ, बिना किसी सामाजिक बंधन के भगवान से प्रेम) की स्थापना हो सके, जो कि भक्ति का सबसे उच्च स्तर माना जाता है।

7. श्रीमद्भागवत महापुराण में राधा जी का नाम क्यों नहीं है?

यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है जो अक्सर राधा रानी के इतिहास के बारे में पूछा जाता है कि— “अगर राधा जी इतनी महत्वपूर्ण हैं, तो 18 पुराणों में सर्वश्रेष्ठ ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ में उनका सीधा नाम क्यों नहीं लिखा गया है?”

इसके पीछे एक बहुत ही गहरा और भावपूर्ण कारण है:

श्रीमद्भागवत पुराण के वक्ता शुकदेव गोस्वामी जी हैं। शुकदेव जी राधा रानी के तोते (Shuka) के अवतार माने जाते हैं। शुकदेव जी का राधा रानी के प्रति इतना गहरा प्रेम और सम्मान था कि वे राधा जी का नाम लेते ही 6-6 महीने के लिए ‘भाव समाधि’ (Unconscious state of ecstasy) में चले जाते थे।

जब शुकदेव जी राजा परीक्षित को भागवत कथा सुना रहे थे, तो राजा परीक्षित के पास मृत्यु (तक्षक नाग के काटने) का समय केवल 7 दिन का था। अगर शुकदेव जी भूल से भी ‘राधा’ नाम ले लेते, तो वे समाधि में चले जाते और परीक्षित का उद्धार नहीं हो पाता।

इसीलिए शुकदेव जी ने पूरी भागवत में राधा जी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, बल्कि उन्हें “अनया आराधितो नूनं” (जिनके द्वारा भगवान की आराधना की गई) कहकर संबोधित किया। इसी ‘आराधितो’ शब्द से ‘राधा’ शब्द की उत्पत्ति होती है।

RAHDA RANI

8. राधा रानी की अष्टसखियां (Ashta Sakhis of Radha)

राधा रानी कभी अकेली नहीं रहतीं; वे हमेशा अपनी सखियों (गोपियों) से घिरी रहती हैं। इनमें 8 सखियां सबसे प्रमुख हैं, जिन्हें ‘अष्टसखी’ कहा जाता है। ये सभी राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं में सहायता करती हैं:

  1. ललिता (Lalita): सबसे बड़ी और राधा जी की सबसे करीबी सखी। ये कृष्ण को ताना मारने और राधा जी का पक्ष लेने में सबसे आगे रहती हैं।
  2. विशाखा (Vishakha): राधा जी के जन्म नक्षत्र में ही जन्मी हैं। ये वस्त्र और श्रृंगार में निपुण हैं।
  3. चित्रा (Chitra): जो राधा-कृष्ण की लीलाओं के चित्र बनाती हैं।
  4. चम्पकलता (Champakalata): रसोई और पाक कला में निपुण।
  5. तुंगविद्या (Tungavidya): संगीत और नृत्य कला में माहिर।
  6. इन्दुलेखा (Indulekha): जो राधा-कृष्ण के बीच गुप्त संदेश ले जाती हैं।
  7. रंगदेवी (Rangadevi): सुगंधित इत्र और चंदन तैयार करने वाली।
  8. सुदेवी (Sudevi): जल की व्यवस्था करने वाली सखी।

इन सखियों के बिना वृंदावन का इतिहास और रासलीला की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

9. कृष्ण का मथुरा गमन और राधा रानी का विरह

राधा रानी का इतिहास केवल मिलन का नहीं, बल्कि संसार के सबसे महान त्याग और ‘विरह’ (Separation) का भी है। श्रीदामा का शाप सत्य होना था— 100 वर्ष का विरह।

जब कंस का वध करने का समय आया, तो अक्रूर जी कृष्ण और बलराम को मथुरा ले जाने के लिए वृंदावन आए। कृष्ण के जाने की खबर सुनकर पूरा वृंदावन आंसुओं में डूब गया। राधा रानी का हृदय टूट गया।

जब कृष्ण अपने रथ पर जा रहे थे, तो राधा जी ने उन्हें नहीं रोका। उन्होंने केवल इतना कहा, “तुम जा रहे हो, लेकिन मेरा हृदय हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।” कृष्ण ने राधा जी को अपना बांसुरी सौंप दी और वादा किया कि वे लौटकर आएंगे। लेकिन कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा गए, फिर द्वारका गए और कभी वापस ब्रज नहीं लौटे।

उद्धव गीता:

कृष्ण ने अपने मित्र उद्धव को ज्ञान का अहंकार तोड़ने और गोपियों को संदेश देने के लिए वृंदावन भेजा। उद्धव ने राधा और गोपियों को ‘निर्गुण ब्रह्म’ (निराकार भगवान) का ज्ञान देना चाहा, लेकिन राधा जी के प्रेम और विरह की गहराई देखकर उद्धव स्वयं रो पड़े और प्रेम के पुजारी बनकर वापस लौटे।

RADHA RANI

10. राधा रानी का अंतर्धान: उनका अंतिम समय कैसे बीता?

राधा रानी के अंतिम समय और मृत्युलोक छोड़ने की कथा बहुत ही मार्मिक है। 100 वर्षों के विरह के बाद, कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के अवसर पर राधा रानी, नंद बाबा, यशोदा और सभी बृजवासी कुरुक्षेत्र गए थे। वहां श्रीकृष्ण अपनी पटरानियों (रुक्मिणी, सत्यभामा आदि) के साथ आए थे।

कुरुक्षेत्र में महामिलन:

यहीं पर 100 साल बाद राधा और कृष्ण का मिलन हुआ। यह मिलन शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। कृष्ण की पटरानियों ने राधा जी का आदर-सत्कार किया। रुक्मिणी जी ने जब राधा जी को देखा तो वे समझ गईं कि कृष्ण के हृदय में केवल राधा ही क्यों बसती हैं।

राधा जी का द्वारका गमन:

कुछ लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, राधा जी अपने जीवन के अंतिम समय में द्वारका गईं। वहां उन्होंने किसी को अपनी पहचान नहीं बताई और महल में एक सेविका के रूप में रहने लगीं, ताकि वे हर समय कृष्ण के दर्शन कर सकें। लेकिन महल की चकाचौंध में उन्हें वह आनंद नहीं मिला जो वृंदावन की कुंज गलियों में था।

एक दिन राधा जी महल छोड़कर द्वारका के जंगलों में चली गईं। श्रीकृष्ण को जब यह पता चला, तो वे भागते हुए राधा जी के पास पहुंचे। राधा जी का अंतिम समय आ चुका था।

कृष्ण ने राधा जी से कुछ मांगने को कहा। राधा जी ने मना कर दिया, लेकिन कृष्ण के जिद करने पर राधा जी ने कहा, “मैं एक आखिरी बार आपको बांसुरी बजाते हुए देखना और सुनना चाहती हूं।” श्रीकृष्ण ने अपनी सबसे मधुर धुन बजाई। उस धुन को सुनते-सुनते, राधा रानी ने अपने प्राण त्याग दिए और आध्यात्मिक रूप से वे वापस भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गईं (या गोलोक लौट गईं)। कहा जाता है कि राधा जी के जाने के बाद, श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी तोड़ दी और उसके बाद जीवन में कभी बांसुरी नहीं बजाई।

11. निष्कर्ष (Conclusion)

राधा रानी का इतिहास (Radha Rani Ka Itihaas) हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम क्या होता है। संसार का प्रेम स्वार्थ (Kama) पर टिका है, लेकिन राधा-कृष्ण का प्रेम पूर्ण समर्पण (Prema) है।

राधा कोई शरीर नहीं, एक ‘भाव’ हैं। जब तक आपके मन में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आता, तब तक कृष्ण की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिए कहा जाता है कि कृष्ण भगवान हैं, लेकिन राधा कृष्ण की भी भगवान हैं। यदि कृष्ण तक पहुंचना है, तो मार्ग केवल राधा रानी के चरणों से होकर ही जाता है। इसीलिए ब्रज का बच्चा-बच्चा आज भी एक ही मंत्र जपता है—

“राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी!”

Shri Krishna Ka Itihaas: श्री कृष्ण का इतिहास: जन्म, लीलाएं, द्वारका और महाभारत का पूरा सफर 2026

Khatu Shyam Ji Ka Itihas : खाटू श्याम जी का इतिहास और बर्बरीक की संपूर्ण कहानी | हारे का सहारा 2026

12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs on Radha Rani History in Hindi)

Q1. राधा रानी की माता और पिता का क्या नाम था?

Ans. राधा रानी के पिता का नाम राजा वृषभानु और माता का नाम रानी कीर्तिदा था।

Q2. राधा जी का जन्म कैसे हुआ था?

Ans. राधा जी किसी माता के गर्भ से पैदा नहीं हुई थीं। वे रावल गांव में यमुना किनारे एक बड़े से कमल के फूल पर कन्या के रूप में राजा वृषभानु को मिली थीं।

Q3. राधा और कृष्ण में कौन बड़ा है?

Ans. शारीरिक आयु के अनुसार राधा रानी भगवान श्रीकृष्ण से लगभग 11 महीने (कुछ मान्यताओं में 3 साल) बड़ी थीं।

Q4. क्या राधा और कृष्ण का विवाह हुआ था?

Ans. गर्ग संहिता के अनुसार, भांडीरवन में स्वयं ब्रह्मा जी ने राधा और कृष्ण का गंधर्व विवाह करवाया था। परंतु सामाजिक दृष्टि से राधा जी का विवाह अयान (अभिमन्यु) से हुआ था।

Q5. भागवत पुराण में राधा का नाम क्यों नहीं है?

Ans. भागवत के रचयिता शुकदेव जी राधा रानी के अनन्य भक्त थे। उनका नाम लेते ही वे भाव-समाधि में चले जाते, जिससे परीक्षित को 7 दिन में कथा सुनाना संभव नहीं हो पाता, इसलिए उन्होंने सीधा नाम नहीं लिया।

Q6. राधा रानी की मृत्यु कैसे हुई?

Ans. राधा रानी की मृत्यु नहीं हुई थी, वे अंतर्धान हुई थीं। मान्यता है कि द्वारका में कृष्ण की आखिरी बांसुरी की धुन सुनते हुए उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया और श्रीकृष्ण के तेज में विलीन हो गईं।

Q7. राधा रानी का असली नाम क्या है?

Ans. राधा जी को राधिका, वृषभानु दुलारी, कीर्तिदा नंदिनी, श्यामा, लाडली जू, और ह्लादिनी शक्ति के नाम से भी जाना जाता है।

https://youtu.be/F7K-8cFFbyU

 

.

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *