शिव विवाह का सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और लोक-साहित्यिक विवेचन: दूल्हा बने त्रिपुरारि शिव भोला भंडारी Lyrics का विश्लेषण
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। यह केवल दो दैवीय शक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि यह वैराग्य और गृहस्थी, शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा), तथा पुरुष और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक है । लोक मानस में इस प्रसंग को जितनी आत्मीयता और उल्लास के साथ गाया गया है, वह किसी अन्य कथा में दुर्लभ है। विशेष रूप से, दूल्हा बने त्रिपुरारि शिव भोला भंडारी Lyrics पर आधारित यह भजन शिव के उस ‘अघोर’ और ‘कल्याणकारी’ स्वरूप को जीवंत करता है, जहाँ वे समस्त सामाजिक मर्यादाओं और सौंदर्य के पारंपरिक पैमानों को चुनौती देते हुए नजर आते हैं । प्रस्तुत शोध पत्र इस भजन की प्रत्येक पंक्ति का गहन विश्लेषण करते हुए इसके दार्शनिक, पौराणिक और लोक-सांस्कृतिक पहलुओं को उजागर करता है।
Lyrics : Shiv Vivah Bhajan
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
आज सुनो शिव जी के द्वारे,
भीड़ मची है भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
भूत प्रेत सब जुर मिल आये,
ढंग बड़े बेढंगा लूला लंगड़ा
काना कुबड़ा, कोऊ कोऊ नंग धडंगा
कौनऊ दुबरौ कौनऊ पतरौ,
कौनऊ कौनऊ भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
राख ओल बाघंबर पहने,
बहे जटा सें गंगा
कंकन हाथ बांध बिछुअन के,
लिपटो गरे भुजंगा
हाथी घोड़ा जूजो नैयां,
डूंड़ा करी सवारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
देख दशा भोले की बोले,
देवों सें जगदीश्वर
अपनी टोली अलग बना लो,
अलग चलें नंदीश्वर
संग निगें तौ पर पुर जाकैं,
कटहै नाक हमारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
सुन सुन बातें कमलापति की,
भोले मन मुस्कावें
ऐसौ भलौ स्वभाव हरि,
के व्यंग वचन न जावैं
भले दूर सें निगौ छवि न,
मन सें हटै तुम्हारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
बाजन लागे ढोल ढमाढम,
बजन लगो रमतूला
देख देख सब हंसी उड़ावें,
भलौ बने है दूल्हा
नाचन लागे भूत प्रेत,
भई चलवे की तैयारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
उतै हिमाचल जू नै अपनो,
ऐसो नगर संवारौ
आज लगै ऐसै जैसै,
धरती पै स्वर्ग उतारो
गली गली और नगर नगर की,
देखो शोभा न्यारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी प
हुचन लगी बारात नगर में,
देखन खौं सब आये.
पैल देख देवों की टोली,
सब मन में हर्षाये
जब देखी दूल्हा कि सूरत,
भगदड़ मच गई भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिवभोला भंडारी
घर घर में सब खबर सुना रये,
ऐसी लड़का बाले
बड़ो भयंकर दूल्हा देखो,
संग भूत मतवारे
देखत जिंदा बचो समझलो,
ऊकी किस्मत भारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
मैना रानी बड़ी दुखी भई,
जियत उमा न ब्याहों
लै बिटिया खों गिरौ कुंआ या,
खाय जहर मर जाहों
तब आये नारद जी आकैं,
सबरी बात संवारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
भओ शिव के संग ब्याह उमा कौ,
घर घर बजे बधाये
मंगल गान अप्सरा गावें,
देव फू्ल बरसावै
विदा भई शिव संग उमा की,
खुशी भये नर नारी
दूल्हा बने त्रिपुरारि
शिव भोला भंडारी
शिव विवाह की दार्शनिक पृष्ठभूमि और प्रासंगिकता
शिव और पार्वती का विवाह हिंदू पौराणिक कथाओं में एक अद्वितीय स्थान रखता है क्योंकि यह ‘योग’ को ‘भोग’ से और ‘त्याग’ को ‘स्वीकार’ से जोड़ता है। सती के आत्मदाह के उपरांत शिव घोर वैराग्य में चले गए थे और उनकी समाधि ने सृष्टि के संतुलन को प्रभावित किया था । तारकासुर जैसे राक्षसों के वध के लिए शिव का गृहस्थ बनना अनिवार्य था, जिसके लिए माता पार्वती ने कठिन तपस्या की । यह भजन उसी परिणति का उत्सव है जब शिव अपनी समाधि त्यागकर दूल्हे के रूप में हिमाचल के द्वार पर पहुँचते हैं ।
भजन का भाषाई और क्षेत्रीय संदर्भ
इस भजन की भाषा सरल हिंदी के साथ-साथ बुंदेली और ब्रज की मिठास लिए हुए है। “दूल्हा बने त्रिपुरारि” में प्रयुक्त शब्दावली जैसे ‘जुर मिल’, ‘बेढंगा’, ‘निगौ’ और ‘बधाये’ इस बात का प्रमाण हैं कि यह गीत लोक कंठों से निकला है और जनसामान्य की भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है । यह क्षेत्रीय प्रभाव इसे केवल एक धार्मिक पाठ तक सीमित न रखकर एक सांस्कृतिक धरोहर बना देता है।
प्रथम चरण: आगमन और विरोधाभासी व्यक्तित्व का चित्रण
पंक्ति: दूल्हा बने त्रिपुरारि शिव भोला भंडारी, आज सुनो शिव जी के द्वारे, भीड़ मची है भारी
इस प्रारंभिक पंक्ति में शिव के दो अत्यंत विपरीत नामों का प्रयोग किया गया है—’त्रिपुरारि’ और ‘भोला भंडारी’। ‘त्रिपुरारि’ वह शक्ति है जिसने अहंकार और अज्ञान के तीन पुरों (नगरों) का विनाश किया, जो शिव के रुद्र और विनाशक स्वरूप को दर्शाता है । वहीं, ‘भोला भंडारी’ उनके उस स्वरूप को परिभाषित करता है जो अत्यंत सरल, सहज और भक्तों पर सर्वस्व लुटा देने वाला है ।
शिव के द्वार पर ‘भारी भीड़’ का होना उस सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रतीक है, जहाँ देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष और गंधर्व ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति और जीव मात्र उनके इस नए अवतार के साक्षी बनने आए हैं । यह ‘द्वारे’ पर होने वाली भीड़ उस संधि स्थल का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ वैराग्य का मार्ग अब गृहस्थी की ओर मुड़ने वाला है।
| शब्द | पौराणिक अर्थ | प्रतीकात्मक महत्व |
| त्रिपुरारि | तीन असुर नगरों का संहारक | तमोगुण और अहंकार का नाश |
| भोला भंडारी | सरलता का सागर | सहज भक्ति और उदारता |
| शिव जी का द्वार | वह स्थान जहाँ भक्त और भगवान मिलते हैं | मोक्ष की दहलीज |
द्वितीय चरण: बारात की अद्वितीय संरचना और सामाजिक समरसता
पंक्तियाँ: भूत प्रेत सब जुर मिल आये, ढंग बड़े बेढंगा, लूल्ला लंगड़ा काना कुबड़ा, कोऊ कोऊ नंग धडंगा, कौनऊ दुबरौ कौनऊ पतरौ, कौनऊ कौनऊ भारी
शिव की बारात का यह वर्णन हिंदू धर्म के सबसे क्रांतिकारी और समावेशी दर्शन को प्रस्तुत करता है। जहाँ सांसारिक विवाहों में सौंदर्य और कुलीनता को महत्व दिया जाता है, वहीं शिव की बारात में ‘अछूत’ और ‘अस्वीकार्य’ माने जाने वाले तत्वों को भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है ।
शिव के गणों का आध्यात्मिक विश्लेषण
शिव पुराण के अनुसार, शिव की बारात में केवल देवगण ही नहीं थे, बल्कि ‘प्रमथ’ और ‘भूत-प्रेत’ भी सम्मिलित थे । ‘लूल्ला-लंगड़ा’ और ‘काना-कुबड़ा’ जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि शिव शारीरिक दोषों से परे आत्मा की शुद्धता को देखते हैं। यह बारात सृष्टि की उस संपूर्णता का प्रतीक है जिसमें कुरूपता और विरूपता को भी दैवीय गरिमा दी गई है । “नंग धडंगा” होना बाहरी आवरणों और माया के परित्याग का संकेत है। शिव की बारात में विविधता की चरम सीमा है—कोई अत्यंत दुर्बल (पतरौ) है तो कोई भीमकाय (भारी) है ।
| गणों का स्वरूप | शास्त्रीय संदर्भ | प्रतीकात्मक अर्थ |
| भूत-प्रेत | त्याज्य आत्माएं | मृत्यु और विनाश की स्वीकृति |
| शारीरिक रूप से अक्षम | हीनभावना से ग्रस्त जीव | दिव्य प्रेम में पूर्णता की प्राप्ति |
| नाना वेश (बेढंगा) | विविधता |
प्रकृति की अनंत शैलियाँ |
शिव का ‘पशुपति’ रूप यहाँ चरितार्थ होता है, जो सभी योनियों के स्वामी हैं और जो किसी के साथ भेदभाव नहीं करते ।
तृतीय चरण: शिव का अद्भुत श्रंगार और वैराग्य के चिह्न
पंक्तियाँ: राख ओल बाघंबर पहने, बहे जटा सें गंगा, कंकन हाथ बांध बिछुअन के, लिपटो गरे भुजंगा, हाथी घोड़ा जूजो नैयां, डूंड़ा करी सवारी
एक सामान्य दूल्हा रेशमी वस्त्र और स्वर्ण आभूषण धारण करता है, परंतु भगवान शिव का श्रंगार उनके ‘अघोर’ स्वरूप का प्रकटीकरण है ।
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राख (भस्म) और बाघंबर: चिता की भस्म (राख) शरीर की नश्वरता और वैराग्य का सर्वोच्च चिह्न है। बाघंबर (बाघ की खाल) काम-क्रोध और पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण का प्रतीक है ।
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जटा और गंगा: शिव की जटाएँ आकाश का विस्तार हैं और उनमें गंगा का प्रवाह ज्ञान की अविरलता और मानसिक शांति का सूचक है ।
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सर्प और बिच्छू (भुजंगा-बिछुअन): कलाई पर बिच्छुओं का कंगन और गले में सर्पों का हार यह दर्शाता है कि शिव ने ‘काल’ और ‘विष’ को अपना आभूषण बना लिया है। जो जीव दूसरों के लिए डरावने या घातक हैं, वे शिव की छत्रछाया में सुरक्षित और शांत हैं ।
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नंदी (डूंड़ा) की सवारी: शिव के पास वैभवशाली रथ या गज-अश्व नहीं हैं। वे ‘डूंड़ा’ (बूढ़े बैल या नंदी) पर सवार हैं । नंदी धर्म का प्रतीक है, और बूढ़े बैल की सवारी यह संदेश देती है कि शिव शक्तिहीन और उपेक्षितों के भी रक्षक हैं।
चतुर्थ चरण: विष्णु का हास्य और देव-संवाद
पंक्तियाँ: देख दशा भोले की बोले, देवों सें जगदीश्वर, अपनी टोली अलग बना लो, अलग चलें नंदीश्वर, संग निगें तौ पर पुर जाकैं, कटहै नाक हमारी
रामचरितमानस और लोक परंपराओं में यह प्रसंग अत्यंत रोचक है। यहाँ ‘जगदीश्वर’ भगवान विष्णु के लिए प्रयुक्त हुआ है । विष्णु, जो स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम और ऐश्वर्य के स्वामी हैं, शिव के इस ‘विचित्र’ वेश को देखकर देवताओं से परिहास करते हैं। “नाक कटने” का मुहावरा सामाजिक प्रतिष्ठा के खोने के भय को दर्शाता है ।
विष्णु का यह सुझाव कि ‘अपनी टोली अलग बना लो’, वास्तव में दो भिन्न विचारधाराओं के मिलन का संकेत है। देवता, जो सौंदर्य और व्यवस्था के प्रतीक हैं, और शिव के गण, जो अव्यवस्था और विनाश के प्रतीक हैं, एक ही बारात का हिस्सा हैं, फिर भी उनकी टोलियाँ अलग-अलग होने की बात कही जा रही है ताकि नगरवासियों को डराया न जाए ।
पंक्तियाँ: सुन सुन बातें कमलापति की, भोले मन मुस्कावें, ऐसौ भलौ स्वभाव हरि, के व्यंग वचन न जावैं, भले दूर सें निगौ छवि न, मन सें हटै तुम्हारी
शिव की ‘मुस्कान’ उनकी स्थितप्रज्ञता और विष्णु के प्रति उनके गहरे प्रेम का प्रतीक है । शिव जानते हैं कि ‘हरि’ (विष्णु) का यह व्यंग्य द्वेषपूर्ण नहीं बल्कि प्रेमपूर्ण है। यहाँ शिव का उत्तर वेदांत दर्शन की गहराई लिए हुए है—बाहरी रूप से भले ही हम अलग दिखें, लेकिन सूक्ष्म रूप से ‘हरि’ और ‘हर’ (शिव) एक ही हैं 。 “मन से हटै तुम्हारी” यह दर्शाता है कि शिव और विष्णु एक-दूसरे के हृदय में वास करते हैं, और यह विवाह इन दोनों शक्तियों के समन्वय का उत्सव है।
पंचम चरण: संगीत का उल्लास और लोक वाद्य ‘रमतूला’
पंक्तियाँ: बाजन लागे ढोल ढमाढम, बजन लगो रमतूला, देख देख सब हंसी उड़ावें, भलौ बने है दूल्हा, नाचन लागे भूत प्रेत, भई चलवे की तैयारी
शिव विवाह की बारात में वाद्य यंत्रों का वर्णन इसे लोक संस्कृति से जोड़ता है। ‘ढोल’ के साथ ‘रमतूला’ का उल्लेख विशेष महत्व रखता है।
रमतूला: बुंदेलखंड का सांस्कृतिक धरोहर
‘रमतूला’ बुंदेलखंड का एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है जो विवाह और मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता था । इसकी आवाज दूर तक जाती थी और लोगों को उत्सव की सूचना देती थी। भजन में इसका उल्लेख इसे क्षेत्रीय लोक गाथाओं (जैसे बुंदेली राई या लोकगीत) से जोड़ता है । “हंसी उड़ाना” उन लोगों की प्रतिक्रिया है जो शिव के बाह्य रूप के पीछे छिपे ‘सत्य’ और ‘शिव’ (कल्याण) को नहीं देख पा रहे हैं। ‘भूत-प्रेतों का नाचना’ उस परमानंद की स्थिति है जहाँ मृत्यु और जीवन के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है ।
| वाद्य यंत्र | उपयोग | प्रतीकात्मक महत्व |
| ढोल | उत्सव और ऊर्जा | सामूहिक चेतना का जागरण |
| रमतूला | विवाह और निमंत्रण |
लोक परंपरा का सम्मान |
| डमरू | नाद और लय |
ब्रह्मांड का सृजन और विनाश |
षष्ठ चरण: हिमाचल नगर की दिव्यता और बारात का प्रभाव
पंक्तियाँ: उतै हिमाचल जू नै अपनो, ऐसो नगर संवारौ, आज लगै ऐसै जैसै, धरती पै स्वर्ग उतारो, गली गली और नगर नगर की, देखो शोभा न्यारी
राजा हिमाचल ने अपनी पुत्री उमा (पार्वती) के विवाह के लिए नगर को भव्य रूप दिया था। ‘धरती पर स्वर्ग उतारना’ माता पार्वती के ऐश्वर्य और उनके माता-पिता के वात्सल्य को दर्शाता है । नगर की यह भौतिक सुंदरता शिव की आंतरिक और आध्यात्मिक सादगी के साथ एक गहरा विरोधाभास पैदा करती है।
पंक्तियाँ: पहुचन लगी बारात नगर में, देखन खौं सब आये, पैल देख देवों की टोली, सब मन में हर्षाये, जब देखी दूल्हा कि सूरत, भगदड़ मच गई भारी
नगरवासी उत्सुकता से बारात देखने आए। देवताओं की सुंदर टोली (विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र) को देखकर वे आश्वस्त थे कि दूल्हा अत्यंत सुंदर होगा । परंतु शिव की वास्तविकता—मुंडमाला, भस्म, और सर्प—को देखते ही लोग भयभीत होकर भागने लगे । यह दृश्य मानवीय धारणाओं और दिव्य वास्तविकता के बीच के संघर्ष को चित्रित करता है।
सप्तम चरण: भय का संचार और माता मैना का विलाप
पंक्तियाँ: घर घर में सब खबर सुना रये, ऐसी लड़का बाले, बड़ो भयंकर दूल्हा देखो, संग भूत मतवारे, देखत जिंदा बचो समझलो, ऊकी किस्मत भारी
छोटे बच्चों और नगरवासियों द्वारा घर-घर जाकर यह कहना कि “दूल्हा भयंकर है”, यह अज्ञानता की पराकाष्ठा है। ‘जिंदा बचो’ का मुहावरा यह बताता है कि शिव का अघोर रूप सांसारिक मनुष्यों के लिए कितना डरावना हो सकता है । वे इसे विवाह नहीं, बल्कि एक प्रलयकारी घटना मान रहे थे।
पंक्तियाँ: मैना रानी बड़ी दुखी भई, जियत उमा न ब्याहों, लै बिटिया खों गिरौ कुंआ या, खाय जहर मर जाहों
माता मैना का विलाप इस भजन का सबसे संवेदनशील और भावनात्मक मोड़ है। एक माता के रूप में, जो अपनी पुत्री के लिए सर्वश्रेष्ठ की कामना करती है, शिव का वह स्वरूप उन्हें अस्वीकार्य था । यहाँ ‘जहर खाना’ या ‘कुएं में गिरना’ जैसे शब्द उस तीव्र वेदना को दर्शाते हैं जो एक मोहग्रस्त माता अनुभव करती है। मैना यह नहीं जानती थीं कि उनकी पुत्री उमा स्वयं आदि-शक्ति हैं और शिव के बिना वे अपूर्ण हैं ।
अष्टम चरण: नारद की मध्यस्थता और सत्य का प्रकटीकरण
पंक्तियाँ: तब आये नारद जी आकैं, सबरी बात संवारी, दूल्हा बने त्रिपुरारि शिव भोला भंडारी
जब स्थिति बेकाबू होने लगी, तब नारद मुनि का आगमन होता है। नारद ही वह पात्र हैं जिन्होंने पार्वती को तपस्या के लिए प्रेरित किया था और जिन्होंने हिमाचल को शिव की महानता बताई थी ।
नारद जी ने मैना और हिमाचल को समझाया कि:
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शिव का कोई कुल, जाति या रूप नहीं है, वे स्वयं ब्रह्म हैं ।
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उनका यह रूप केवल पार्वती की तपस्या की अग्नि को शीतल करने और जगत को वैराग्य का पाठ पढ़ाने के लिए है ।
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पार्वती और शिव का संबंध सनातन है, जिसे कोई सांसारिक बाधा नहीं तोड़ सकती 。
नारद के इन वचनों ने अज्ञान के अंधकार को दूर किया और माता मैना का हृदय परिवर्तन हुआ 。
नवम चरण: शुभ विवाह और सार्वभौमिक उल्लास
पंक्तियाँ: भओ शिव के संग ब्याह उमा कौ, घर घर बजे बधाये, मंगल गान अप्सरा गावें, देव फू्ल बरसावै, विदा भई शिव संग उमा की, खुशी भये नर नारी
अंततः शिव और पार्वती का विवाह विधि-विधान से संपन्न हुआ । यहाँ ‘बधाये’ का बजना उस आनंद की प्राप्ति है जो संघर्ष और तपस्या के बाद मिलता है। अप्सराओं का गायन और देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा इस विवाह की दैवीय अनुमति का प्रतीक है । विदाई के समय ‘नर-नारी’ की खुशी यह दर्शाती है कि समाज ने अब शिव के कल्याणकारी रूप को स्वीकार कर लिया है।
| विवाह के चरण | आध्यात्मिक महत्व | परिणाम |
| तपस्या (पार्वती द्वारा) | संकल्प और भक्ति |
शिव का जागरण |
| बारात (विचित्र वेश) | मोह का परीक्षण |
अज्ञान का नाश |
| पाणिग्रहण | चेतना और ऊर्जा का मिलन |
सृष्टि का संतुलन |
| विदाई | समर्पण | परमानंद की प्राप्ति |
शिव विवाह के प्रतीकों का विस्तृत विश्लेषण
शिव विवाह की कथा में प्रयुक्त प्रत्येक प्रतीक का अपना एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार है जो इस भजन के अर्थ को और गहरा बनाता है।
1. गंगा और चंद्रमा (ज्ञान और शांति)
शिव की जटाओं में गंगा और मस्तक पर चंद्रमा का होना यह दर्शाता है कि चरम शक्ति के साथ चरम शांति और शीतलता का होना अनिवार्य है। ज्ञान (गंगा) और समय (चंद्रमा) शिव के नियंत्रण में हैं ।
2. बाघंबर और मुंडमाला (जीवन और मृत्यु)
बाघ की खाल पहनना प्रकृति की हिंसक शक्तियों पर विजय का प्रतीक है, जबकि मुंडमाला यह याद दिलाती है कि समय निरंतर बदल रहा है और मृत्यु जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है ।
3. त्रिशूल और डमरू
त्रिशूल तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) और तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) पर आधिपत्य का प्रतीक है। डमरू की ध्वनि सृष्टि के स्पंदन का आधार है ।
शिव-पार्वती विवाह का सामाजिक संदेश
यह भजन केवल भक्ति के लिए नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज के लिए भी कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
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विविधता का सम्मान: शिव की बारात हमें सिखाती है कि समाज में हर प्रकार के व्यक्ति (चाहे वे शारीरिक रूप से अक्षम हों या सामाजिक रूप से उपेक्षित) का अपना महत्व और स्थान है ।
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आंतरिक सुंदरता: मैना का आरंभिक दुख बाहरी सुंदरता पर आधारित था, लेकिन नारद ने उन्हें आंतरिक दिव्यता देखने की दृष्टि दी। यह हमें सिखाता है कि दिखावे से अधिक मूल्य चरित्र और गुणों का होता है ।
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समर्पण और धैर्य: पार्वती की तपस्या और शिव की प्रतीक्षा यह सिद्ध करती है कि महान लक्ष्य प्राप्त करने के लिए धैर्य और अटूट विश्वास आवश्यक है ।
निष्कर्ष
दूल्हा बने त्रिपुरारि शिव भोला भंडारी Lyrics पर आधारित यह विस्तृत विवेचन हमें भगवान शिव के उस असीम प्रेम और सर्वसमावेशी स्वभाव की ओर ले जाता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपना परिवार मानता है। शिव का विवाह भौतिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के कल्याण और अधर्म के नाश के लिए था । यह भजन लोक संगीत की मिठास के साथ-साथ उपनिषदों के गहन सत्यों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। जब हम इस गीत को सुनते या गाते हैं, तो हम केवल एक कहानी नहीं सुन रहे होते, बल्कि हम अपनी ही आत्मा की परमात्मा से मिलन की यात्रा का अनुभव कर रहे होते हैं । शिव और पार्वती का यह मिलन हमें सिखाता है कि जीवन के विष को स्वीकार करते हुए भी कैसे ‘नीलकंठ’ और ‘मंगलकारी’ बना जा सकता है ।
शिव विवाह (Shiv Vivah): भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की संपूर्ण कथा और महत्व