Mata Parvati : माता पार्वती का इतिहास, जन्म, तपस्या और संपूर्ण कहानी 2026 माता पार्वती का अद्भुत इतिहास, जन्म और पवित्र कहानी | Amazing History

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माता पार्वती (Mata Parvati) का इतिहास, जन्म, तपस्या और संपूर्ण कहानी: शिव की अर्धांगिनी का अद्भुत सफर –

हिंदू धर्म और पौराणिक कथाओं में माता पार्वती (Mata Parvati) का इतिहास (Mata Parvati ka Itihas) प्रेम, समर्पण, शक्ति और त्याग की सबसे महान कहानियों में से एक माना जाता है। भगवान शिव, जो वैरागी हैं और मोह-माया से दूर कैलाश पर निवास करते हैं, उन्हें एक पारिवारिक और सांसारिक रूप में ढालने का श्रेय केवल और केवल माता पार्वती को ही जाता है।

माता पार्वती (Mata Parvati) केवल भगवान शिव की पत्नी ही नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड की आदिशक्ति हैं। शिव अगर ‘शव’ से ‘शिव’ बनते हैं, तो वह शक्ति (पार्वती) के कारण ही संभव है। शिव ‘पुरुष’ हैं तो पार्वती ‘प्रकृति’ हैं। इन दोनों के बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आज के इस लेख में हम माता पार्वती (Mata Parvati) के इतिहास, उनके पूर्व जन्म की कथा, उनके जन्म, उनकी कठोर तपस्या, भगवान शिव के साथ उनके अलौकिक विवाह और उनके विभिन्न स्वरूपों के बारे में विस्तार से जानेंगे। यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है, जो सच्चे प्रेम, धैर्य और असीम शक्ति के अर्थ को समझना चाहता है।

 

Mata Parvati

माता पार्वती (Mata Parvati) के पूर्व जन्म की कथा: देवी सती का स्वरूप

माता पार्वती (Mata Parvati) के इतिहास को पूरी तरह से समझने के लिए हमें उनके पूर्व जन्म की ओर लौटना होगा। माता पार्वती अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री ‘सती’ थीं। प्रजापति दक्ष ब्रह्मा जी के पुत्र थे और एक अत्यंत शक्तिशाली तथा अभिमानी राजा थे।

देवी सती बचपन से ही भगवान शिव की परम भक्त थीं और मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी थीं। जब सती विवाह योग्य हुईं, तो दक्ष ने उनके लिए कई राजकुमारों को चुना, लेकिन सती ने स्पष्ट कर दिया कि वे केवल भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। प्रजापति दक्ष भगवान शिव को एक अघोरी, श्मशान वासी और अमर्यादित मानते थे, इसलिए वे इस विवाह के सख्त खिलाफ थे।

कठोर तपस्या के बाद देवी सती ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और दोनों का विवाह संपन्न हुआ। लेकिन इस विवाह ने दक्ष के मन में शिव के प्रति घृणा को और बढ़ा दिया।

प्रजापति दक्ष का यज्ञ और शिव का अपमान

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल महायज्ञ (कनखल, हरिद्वार में) का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और मुनियों को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं दिया।

जब माता सती ने आकाश मार्ग से देवताओं को अपने पिता के घर जाते देखा, तो उन्हें यज्ञ के बारे में पता चला। सती ने शिव जी से यज्ञ में जाने की जिद की। भगवान शिव ने उन्हें समझाया, “बिना निमंत्रण के कहीं जाना उचित नहीं है, चाहे वह पिता का घर ही क्यों न हो।” लेकिन सती अपने पिता के घर जाने के मोह को त्याग नहीं पाईं। शिव जी ने अपनी गणाध्यक्षों के साथ उन्हें विदा कर दिया।

माता सती का योगाग्नि में भस्म होना (सती का आत्मदाह)

जब सती अपने पिता दक्ष के महल पहुंचीं, तो वहां किसी ने उनका स्वागत नहीं किया, केवल उनकी माता ने उन्हें गले लगाया। सती ने देखा कि यज्ञ मंडप में सभी देवताओं के लिए स्थान (भाग) सुनिश्चित था, लेकिन भगवान शिव के लिए कोई स्थान नहीं रखा गया था।

जब सती ने अपने पिता से इसका कारण पूछा, तो प्रजापति दक्ष ने भरी सभा में भगवान शिव का घोर अपमान किया। उन्होंने शिव जी को श्मशान वासी, भूतों का सरदार और अमंगलकारी कहा। अपने पति का यह भयंकर अपमान माता सती से सहन नहीं हुआ।

उन्होंने क्रोध में आकर कहा, “जिस शरीर को शिव के निंदक पिता दक्ष ने जन्म दिया है, अब मैं इस शरीर को ही त्याग दूंगी।” यह कहकर सती ने यज्ञ कुंड के समीप बैठकर योग विद्या द्वारा अपने ही शरीर की अग्नि (योगाग्नि) को जाग्रत किया और स्वयं को भस्म कर लिया।

जब भगवान शिव को यह बात पता चली, तो उनके क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने अपने बालों की एक लट उखाड़कर जमीन पर पटकी, जिससे महाभयंकर वीरभद्र और महाकाली उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को तहस-नहस कर दिया और दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।

सती के वियोग में भगवान शिव उनकी जली हुई देह को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटकने लगे। सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए, जो जहां-जहां गिरे, वहां ‘शक्तिपीठ’ स्थापित हुए। सती के जाने के बाद भगवान शिव घोर तपस्या में लीन हो गए और दुनिया से विरक्त हो गए।

 

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माता पार्वती (Mata Parvati) का जन्म और बचपन का इतिहास

सती के आत्मदाह के बाद, तारकासुर नामक एक भयंकर असुर ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है। तारकासुर जानता था कि शिव जी ने वैराग्य धारण कर लिया है और सती के बिना वे कभी विवाह नहीं करेंगे। इसलिए उसे लगा कि वह अब अमर हो गया है। उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देवताओं की प्रार्थना पर आदि पराशक्ति ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे पुनः जन्म लेंगी और भगवान शिव को तपस्या से जगाकर उनसे विवाह करेंगी।

पर्वतराज हिमालय के घर अवतरण

उत्तर दिशा में पर्वतों के राजा हिमालय (हिमवान) और उनकी पत्नी मैनावती निवास करते थे। दोनों आदिशक्ति के परम भक्त थे और उन्हें पुत्री रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रहे थे। माता आदिशक्ति उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्होंने मैनावती के गर्भ से जन्म लिया।

पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उनका नाम ‘पार्वती’ रखा गया। जन्म के समय ही देवताओं ने पुष्प वर्षा की। पार्वती जी बचपन से ही अत्यंत सुंदर, सुशील और शिव-भक्त थीं। वे बचपन में खेल-खेल में भी रेत के शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा किया करती थीं।

देवर्षि नारद की भविष्यवाणी

जब पार्वती जी थोड़ी बड़ी हुईं, तो एक दिन देवर्षि नारद उनके महल में पधारे। नारद मुनि ने पार्वती की हस्तरेखा देखकर पर्वतराज हिमालय से कहा, “महाराज! आपकी पुत्री साक्षात जगदंबा का अवतार है। इसके भाग्य में एक ऐसा पति लिखा है जो योगी हो, जिसके पास कोई संपत्ति न हो, जो शरीर पर भस्म रमाता हो और जिसका कोई माता-पिता न हो।”

यह सुनकर मैनावती अत्यंत दुखी हुईं, लेकिन नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “घबराइए नहीं, ऐसे गुण केवल देवाधिदेव महादेव में ही हैं। यह कन्या भगवान शिव की ही अर्धांगिनी बनेगी।”

यह सुनकर पार्वती जी के मन में शिव के प्रति प्रेम और भी गहरा हो गया और उन्होंने मन ही मन महादेव को अपना पति मान लिया।

 

भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती (Mata Parvati) की कठोर तपस्या

नारद जी की बात सुनकर और अपने पूर्व जन्म की स्मृतियों (जो अवचेतन में थीं) के कारण माता पार्वती (Mata Parvati) ने भगवान शिव को पति रूप में पाने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

शुरुआत में हिमालय राज ने शिव जी की सेवा के लिए पार्वती जी को उस गुफा में भेजा जहां शिव जी ध्यानमग्न थे। पार्वती जी प्रतिदिन वहां जाकर शिव जी के लिए फूल लातीं और वहां की सफाई करती थीं। इसी दौरान देवताओं ने शिव जी का ध्यान भंग करने के लिए कामदेव को भेजा।

कामदेव ने शिव जी पर अपना ‘काम बाण’ चलाया, जिससे शिव जी का ध्यान टूट गया। लेकिन क्रोधित शिव जी ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को वहीं भस्म कर दिया। यह देखकर पार्वती जी समझ गईं कि शिव जी को सुंदरता या श्रृंगार से नहीं, बल्कि केवल कठोर तपस्या और सच्ची भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।

राजमहल का सुख त्यागकर वन गमन

माता पार्वती (Mata Parvati) ने अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर दिया। उन्होंने वल्कल (पेड़ों की छाल) के वस्त्र धारण किए और कठिन तपस्या के लिए ‘गौरी शंकर’ नामक शिखर (गौरीकुंड) पर चली गईं। मैनावती ने उन्हें बहुत रोका और कहा “उमा” (हे पुत्री, मत जा), इसी कारण पार्वती जी का एक नाम ‘उमा’ भी पड़ा।

कैसे पड़ा ‘अपर्णा’ नाम? (The Panchagni Tapasya)

माता पार्वती (Mata Parvati) की तपस्या सामान्य नहीं थी। उन्होंने कई वर्षों तक केवल कंद-मूल खाकर तपस्या की। उसके बाद कई सौ वर्षों तक केवल गिरे हुए सूखे पत्ते (पर्ण) खाकर जीवन व्यतीत किया।

उनका संकल्प इतना दृढ़ था कि एक समय ऐसा आया जब उन्होंने सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया। पत्ते तक खाना छोड़ देने के कारण ही उनका एक अत्यंत प्रसिद्ध नाम ‘अपर्णा’ पड़ा।

उन्होंने गर्मियों में पंचाग्नि तपस्या (चारों ओर आग जलाकर बीच में बैठना), सर्दियों में ठंडे जल में खड़े रहकर और बरसात में खुले आसमान के नीचे रहकर घोर तप किया। उनकी इस भयंकर तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया, लेकिन उनके मुख का तेज करोड़ों सूर्यों के समान चमकने लगा।

 

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सप्तर्षियों और भगवान शिव द्वारा परीक्षा

पार्वती जी की तपस्या की पूर्णता को परखने के लिए पहले शिव जी ने ‘सप्तर्षियों’ को भेजा। सप्तर्षियों ने पार्वती जी से कहा, “शिव जी तो एक वैरागी हैं, उनके पास घर नहीं है, वे गले में सांप लपेटते हैं। तुम राजा की पुत्री हो, विष्णु जी जैसे रूपवान देवता से विवाह कर लो।”

लेकिन पार्वती जी ने क्रोधित होकर कहा, “मैं अगर विवाह करूंगी तो केवल महादेव से, अन्यथा मैं जीवन भर कुंवारी ही रहूंगी। मेरा मन उनके चरणों में अटल है।”

सप्तर्षियों के जाने के बाद, भगवान शिव स्वयं एक ‘जटिल ब्रह्मचारी’ (युवा ब्राह्मण) का रूप धारण करके पार्वती जी के आश्रम पहुंचे। उन्होंने भी शिव जी की खूब निंदा की और उन्हें श्मशान वासी कहा।

अपने इष्ट देव की निंदा सुनकर पार्वती जी ने अपने कान बंद कर लिए और वहां से जाने लगीं। तभी भगवान शिव अपने असली रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हे पार्वती! तुम्हारी तपस्या से मैं हार गया हूं। आज से मैं तुम्हारी तपस्या द्वारा खरीदा हुआ तुम्हारा दास हूं।”

यह सुनते ही माता पार्वती की सारी थकान दूर हो गई और उनके नेत्रों से खुशी के आंसू बहने लगे।

शिव-पार्वती विवाह का अद्भुत और अलौकिक दृश्य

भगवान शिव ने हिमालय राज के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा, जिसे हिमालय राज और मैनावती ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) के दिन शिव और पार्वती का विवाह तय हुआ।

भोलेनाथ की अनोखी बारात

संसार में किसी का विवाह वैसा नहीं हुआ जैसा भगवान शिव का था। देवताओं ने शिव जी को सुंदर वेशभूषा पहनाने की कोशिश की, लेकिन शिव जी तो अपनी ही धुन में थे। उन्होंने अपने शरीर पर श्मशान की ताजी भस्म (राख) मली, गले में मुंडमाला पहनी, बालों की जटाएं बांधी, माथे पर चंद्रमा सजाया और गले में वासुकि नाग को लपेट लिया। उनका वाहन नंदी था।

शिव जी की बारात में केवल देवता ही नहीं थे, बल्कि उनके गण—भूत, प्रेत, पिशाच, चुड़ैलें, डाकिनी, शाकिनी, और यक्ष भी शामिल थे। यह बारात देखकर देवता भी एक तरफ खिसक गए।

मैनावती का मूर्छित होना और शिव का सुंदर रूप

जब यह भयंकर बारात हिमालय राज के महल पहुंची, तो ऐसी भयानक बारात और शिव जी का भस्म लगा, नागों वाला रूप देखकर माता मैनावती डर के मारे मूर्छित (बेहोश) हो गईं। उन्होंने रोते हुए कहा, “मैं अपनी फूल सी कोमल बच्ची का विवाह इस श्मशान वासी से कभी नहीं करूंगी।”

स्थिति बिगड़ती देख माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे कृपया अपने सुंदर और मनमोहक रूप में आएं। अपनी भक्त और भावी पत्नी की बात मानकर भगवान शिव ने अपना अत्यंत सुंदर, अलौकिक और दैवीय स्वरूप धारण किया, जिसे ‘चंद्रशेखर’ स्वरूप कहा जाता है।

इस रूप में शिव जी को देखकर मैनावती और सभी नगरवासी मंत्रमुग्ध हो गए। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान ब्रह्मा जी के पुरोहितत्व में शिव और पार्वती का विवाह अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। यह विवाह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा उत्सव बन गया।

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माता पार्वती (Mata Parvati) के विभिन्न रूप और अवतार

माता पार्वती ( Mata Parvati ) आदिशक्ति का ही रूप हैं। आवश्यकता पड़ने पर ब्रह्मांड के कल्याण और राक्षसों के संहार के लिए उन्होंने समय-समय पर अनेक रूप धारण किए हैं। माता पार्वती के इतिहास में उनके इन रूपों का विशेष महत्व है:

  1. नवदुर्गा (Navdurga): नवरात्रि के नौ दिनों में माता पार्वती (Mata Parvati) के नौ विशिष्ट रूपों की पूजा की जाती है—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। यह सभी माता पार्वती के ही अलग-अलग जीवन काल और स्वरूप हैं।
  2. महाकाली (Mahakali): रक्तबीज और चंड-मुंड जैसे भयंकर असुरों का नाश करने के लिए माता पार्वती ने अपना अत्यंत रौद्र रूप ‘महाकाली’ धारण किया था।
  3. दस महाविद्या (Ten Mahavidyas): तंत्र साधना में माता पार्वती के 10 महाविद्या स्वरूपों की पूजा होती है, जिनमें काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी (षोडशी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला शामिल हैं।
  4. अन्नपूर्णा (Annapurna): संसार का पालन-पोषण करने के लिए उन्होंने अन्नपूर्णा का रूप लिया। एक बार शिव जी को भिक्षा देने के लिए वे इसी रूप में काशी (वाराणसी) में प्रकट हुई थीं।
  5. शाकम्भरी (Shakambhari): पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ने पर माता ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक (सब्जियों) से संसार की भूख मिटाई थी।
  6. कामाख्या (Kamakhya): यह सती का ही स्वरूप है, जहां उनकी योनि गिरी थी, जो आज असम में सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है।

शिव और शक्ति का मिलन: अर्द्धनारीश्वर स्वरूप

माता पार्वती (Mata Parvati) के इतिहास में ‘अर्द्धनारीश्वर’ स्वरूप का अत्यधिक महत्व है। एक बार ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण में कठिनाई आ रही थी क्योंकि वे केवल पुरुषों की रचना कर पा रहे थे जिससे सृष्टि आगे नहीं बढ़ पा रही थी।

तब भगवान शिव ने माता पार्वती (Mata Parvati) को अपने शरीर में समाहित कर लिया और ‘अर्द्धनारीश्वर’ रूप (आधा शरीर पुरुष का और आधा स्त्री का) धारण किया। यह स्वरूप यह संदेश देता है कि ब्रह्मांड में पुरुष और प्रकृति (स्त्री) दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी एक के बिना सृष्टि अधूरी है। स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से शक्तिशाली और महत्वपूर्ण हैं।

 

माता पार्वती (Mata Parvati) का पारिवारिक जीवन

कठोर तपस्या के बाद माता पार्वती (Mata Parvati) कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के साथ निवास करने लगीं। उन्होंने न केवल शिव जी को एक पारिवारिक जीवन दिया, बल्कि ब्रह्मांड को ऐसे पुत्र भी दिए जिन्होंने बुराई का अंत किया।

कार्तिकेय (मुरुगन) का जन्म

तारकासुर का वध करने के लिए शिव और पार्वती की दिव्य ऊर्जा से भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति बनाया गया और उन्होंने मात्र 6 दिन की आयु में ही भयानक राक्षस तारकासुर का वध कर दिया। दक्षिण भारत में कार्तिकेय जी को ‘भगवान मुरुगन’ के नाम से पूजा जाता है।

भगवान गणेश की उत्पत्ति

एक बार माता पार्वती (Mata Parvati) स्नान के लिए जा रही थीं। नंदी शिव जी की आज्ञा मानते थे, इसलिए पार्वती जी ने सोचा कि उनका भी कोई ऐसा गण होना चाहिए जो केवल उनकी आज्ञा माने।

उन्होंने अपने शरीर के मैल (उबटन) से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। यह बालक भगवान गणेश थे। माता ने उन्हें द्वार पर पहरा देने को कहा। जब शिव जी आए तो गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। क्रोध में आकर शिव जी ने गणेश जी का सिर काट दिया। बाद में माता पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए शिव जी ने एक हाथी (गज) का सिर गणेश जी के धड़ पर लगा दिया और उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ होने का वरदान दिया।

पुत्री अशोक सुंदरी का जन्म

पद्म पुराण के अनुसार, माता पार्वती (Mata Parvati) का अकेलापन दूर करने के लिए ‘कल्पवृक्ष’ (इच्छा पूरी करने वाला पेड़) से एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम अशोक सुंदरी रखा गया। यह शिव और पार्वती की पुत्री थीं।

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माता पार्वती (Mata Parvati) से जुड़े प्रमुख व्रत और त्योहार

हिंदू संस्कृति में माता पार्वती (Mata Parvati) को सुहाग, समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कुंवारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं उनका आशीर्वाद पाने के लिए कई व्रत रखती हैं:

माता पार्वती (Mata Parvati) के जीवन से मिलने वाली सीख

माता पार्वती (Mata Parvati) का इतिहास केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह आज के मनुष्य के लिए एक बहुत बड़ा जीवन दर्शन है। उनके जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं:

  1. सच्चा प्रेम और समर्पण: यदि आपके मन में किसी के प्रति सच्चा समर्पण है, तो आप दुनिया की कोई भी बाधा पार कर सकते हैं।
  2. दृढ़ संकल्प (Determination): तपस्या के दौरान पार्वती जी ने दिखा दिया कि यदि इंसान कुछ ठान ले, तो वह असंभव को भी संभव कर सकता है।
  3. स्त्री शक्ति का सम्मान: माता पार्वती (Mata Parvati) यह दर्शाती हैं कि एक स्त्री अत्यंत कोमल और दयालु (अन्नपूर्णा) हो सकती है, लेकिन यदि अन्याय हो, तो वह ‘काली’ और ‘दुर्गा’ बनकर भस्म भी कर सकती है।
  4. समानता का अधिकार: अर्द्धनारीश्वर रूप हमें सिखाता है कि पति और पत्नी दोनों का स्थान जीवन में बराबर है।

निष्कर्ष (Conclusion)

माता पार्वती (Mata Parvati) का इतिहास प्रेम, शक्ति, और त्याग की वह अमर गाथा है जो युगों-युगों तक मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। उन्होंने यह साबित किया कि ईश्वर को भौतिक वस्तुओं से नहीं, बल्कि असीम भक्ति और शुद्ध प्रेम से जीता जा सकता है। सती के रूप में पिता के अहंकार का विरोध करने से लेकर, पार्वती के रूप में शिव की अर्धांगिनी बनने तक का उनका सफर नारी सशक्तिकरण (Women Empowerment) का सबसे बड़ा प्राचीन उदाहरण है।

जब भी हम शिव परिवार की पूजा करते हैं, तो वास्तव में हम उस संतुलन की पूजा करते हैं जो माता पार्वती ने शिव जी के जीवन और इस ब्रह्मांड में स्थापित किया है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. माता पार्वती (Mata Parvati) के माता-पिता का नाम क्या था?

Ans: माता पार्वती (Mata Parvati) के पिता पर्वतों के राजा ‘हिमालय’ (हिमवान) और माता का नाम ‘मैनावती’ था। इसीलिए उन्हें शैलपुत्री और उमा भी कहा जाता है।

Q2. माता पार्वती (Mata Parvati) को ‘अपर्णा’ क्यों कहा जाता है?

Ans: भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई कठोर तपस्या के दौरान, जब माता पार्वती ने भोजन के रूप में सूखे पत्ते (पर्ण) खाना भी छोड़ दिया था, तब उनका नाम ‘अपर्णा’ (बिना पर्ण के) पड़ गया।

Q3. माता पार्वती (Mata Parvati) के पूर्व जन्म का नाम क्या था?

Ans: माता पार्वती अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम ‘सती’ था। उन्होंने पिता द्वारा शिव जी का अपमान किए जाने पर योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे।

Q4. भगवान शिव और पार्वती की कितनी संतानें हैं?

Ans: शिव पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव और पार्वती के दो मुख्य पुत्र हैं – भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) और भगवान गणेश। इसके अलावा उनकी एक पुत्री अशोक सुंदरी और अयप्पा स्वामी का भी उल्लेख मिलता है।

Q5. माता पार्वती (Mata Parvati) के गुस्से वाले रूप कौन से हैं?

Ans: जब संसार पर राक्षसों का संकट आया, तो माता पार्वती ने क्रोधित होकर महाकाली, मां दुर्गा, चंडी और दस महाविद्याओं जैसे उग्र और शक्तिशाली रूप धारण किए।

Q6. शिव और पार्वती के विवाह के दिन कौन सा त्योहार मनाया जाता है?

Ans: भगवान शिव और माता पार्वती (Mata Parvati) के शुभ विवाह के दिन ‘महाशिवरात्रि’ का पावन पर्व मनाया जाता है।

Disclaimer: यह लेख विभिन्न हिंदू पौराणिक ग्रंथों (शिव पुराण, स्कंद पुराण आदि) की मान्यताओं और कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक जानकारी प्रदान करना है।

https://youtu.be/dnRBiAzF8rE

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